वैशाली गढ़ में फहराए जाने वाले राष्ट्र ध्वज को सरकारी समारोह बनाएं – रघुवंश प्रसाद सिंह, पूर्व मंत्री

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वैशाली गढ़ में फहराए जाने वाले राष्ट्र ध्वज को सरकारी समारोह बनाएं – रघुवंश प्रसाद सिंह, पूर्व मंत्री

मुख्य मंत्री नीतीश को रघुवंश सिंह ने लिखे पत्र में की मांग

ANA/Arvind Verma

हाजीपुर। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम लिखे अपने पत्र द्वारा की गई मांग में पूर्व मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने लिखा है कि ”वैशाली जनतंत्र की जननी है. विश्व का प्रथम गणतंत्र है. लेकिन इसमें सरकार ने कुछ नहीं किया है. इसलिए मेरा आग्रह है कि झारखंड राज्य बनने से पहले 15 अगस्त को मुख्यमंत्री पटना में और 26 जनवरी को रांची में राष्ट्र ध्वज फहराते थे. इसी प्रकार 26 जनवरी को पटना में राज्यपाल और मुख्यमंत्री रांची में राष्ट्रध्वज फहराते थे. उसी तरह 15 अगस्त को मुख्यमंत्री पटना में और राज्यपाल विश्व के प्रथम गणतंत्री वैशाली में राष्ट्रध्वज फहराने का निर्णय कर इतिहास की रचना करें. इसी प्रकार 26 जनवरी को राज्यपाल पटना में और मुख्यमंत्री वैशाली गढ़ के मैदान में राष्ट्रध्वज फहरायें. इसलिए कि वैशाली विश्व का प्रथम गणतंत्र है. आप इसे 26 जनवरी, 2021 से वैशाली में राष्ट्रध्वज फहरायें. इस आशय की सारी औपचारिकताएं पूरी हैं. फाइल मंत्रिमंडल सचिवालय में लंबित है. केवल पुरातत्व सर्वेक्षण से अनापत्ति प्रमाण पत्र आना बाकी था, जो आ गया है. आग्रह है कि कृपा कर आप इसे स्वीकृत कर दें. वैशाली गढ़ के मैदान में वहां दस-बारह वर्षों से राष्ट्रध्वज फहराया जा रहा है. इसे सरकारी समारोह बनाने हेतु शीघ्र निर्णय कर दें. आगे उन्होंने कहा है कि भगवान बुद्ध की अस्थियां अवशेष की स्थापना हेतु आपने वैशाली में 432 करोड़ की जमीन अर्जित कर 3-4 सौ करोड़ का स्तूप बनवा रहे हैं, लेकिन विश्व का प्रथम गणतंत्र वैशाली के लिए एक यह भारी काम होगा. विश्व में संदेश जायेगा कि विश्व का प्रथम गणतंत्र, वैशाली में होने के कारण वहां राष्ट्रीय दिवसों पर मुख्यमंत्री और राज्यपाल द्वारा राष्ट्रध्वज फहराया जा रहा है। रघुवंश बाबू ने नीतीश कुमार को लिखे एक अन्य पत्र में कहा लोकसभा में शून्यकाल में मेरे द्वारा भगवान बुद्ध का पवित्र भिक्षापात्र अफगानिस्तान के कंधार से वैशाली लाने हेतु सवाल उठाने पर विदेश मंत्री श्री एसएम कृष्णा ने लिखित उत्तर में कहा कि भगवान बुद्ध का पवित्र भिक्षापात्र अब कंधार में नहीं सुरक्षा कारणों से काबुल म्यूजियम में रखा गया है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से उद्गम का पता लगा कर उसे वैशाली लाया जायेगा. क्योंकि, भगवान बुद्ध अंतिमवें वर्षावास में वैशाली छोड़ने के समय अपना भिक्षापात्र स्मारक के रूप में वैशालीवालों को दिया था. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की लाल फीताशाही की गुटबंदी के कारण पर्याप्त साक्ष्य नहीं है, कह कर ठप करवा दिया, जबकि अफगानिस्तान वाले मोटे अक्षरों में अपने काबुल म्यूजियम भगवान बुद्ध को भिक्षापात्र लिख कर स्वीकार कर रहा है।

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